Monday, September 28, 2026
No Result
View All Result
  • HOME
  • BREAKING
  • PUNJAB
  • HARYANA
  • INDIA
  • WORLD
  • SPORTS
  • ENTERTAINMENT
  • CAREER
  • EDUCATION
  • DHARAM
  • CONTACT US
No Result
View All Result
  • HOME
  • BREAKING
  • PUNJAB
  • HARYANA
  • INDIA
  • WORLD
  • SPORTS
  • ENTERTAINMENT
  • CAREER
  • EDUCATION
  • DHARAM
  • CONTACT US
No Result
View All Result
Ozi News
No Result
View All Result
ADVERTISEMENT
Home आलेख

सोने की चिड़िया: भारत ने 1700 साल तक दुनिया की एक-तिहाई अर्थव्यवस्था पर राज कैसे किया और 250 साल में सब खो दिया

admin by admin
July 18, 2026
in आलेख
Reading Time: 4 mins read
A A
0
भारत
0
SHARES
0
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
ADVERTISEMENT

Table of Contents

Toggle
    • RelatedPosts
    • Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi: कैसे हैदराबाद के एक छोटे से ऑफिस से निकला रॉकेट भारत को अंतरिक्ष की तीसरी महाशक्ति बना गया
  • वह टेबल जो हमारी किताबों से गायब कर दी गई
    • क्या ये आँकड़े पूरी तरह सटीक हैं? (आलोचकों की राय)
  • महाविनाश: कैसे बिखरा 1700 साल का साम्राज्य?
    • क्या वाकई 45 लाख करोड़ डॉलर की लूट हुई थी?
  • आखिर क्या थी भारत के इस आर्थिक वैभव की असली बुनियाद?
    • १. सोने की कोख जैसी उपजाऊ खेती
    • २. बेजोड़ कारीगरी और तकनीक
    • ३. बंदरगाहों का जाल
  • रोम का कबूलनामा: “हमारा खजाना भारत जा रहा है”
  • राजा बदले, हुकूमतें बदलीं, पर तिजोरी नहीं बदली
  • इस इतिहास को हमसे क्यों छुपाया गया?
  • अंतिम विचार: सोने की चिड़िया पिंजरे में कैसे आई?
    • संदर्भ और आगे पढ़ने के लिए (Bibliography)

RelatedPosts

Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi

Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi: कैसे हैदराबाद के एक छोटे से ऑफिस से निकला रॉकेट भारत को अंतरिक्ष की तीसरी महाशक्ति बना गया

July 19, 2026
0
ADVERTISEMENT
  • Twitter
  • WhatsApp
  • Telegram
  • Facebook Messenger
  • Copy Link
  • Facebook

एक ऐसा आँकड़ा है जो हमारे देश के हर बच्चे को ज़ुबानी याद होना चाहिए था। लेकिन विडंबना देखिए, यह हमारी किसी इतिहास की किताब में नहीं मिलता। न तो स्कूल की किताबों में इसका कोई ज़िक्र है, और न ही कॉलेजों में इतिहास की मोटी-मोटी किताबें पढ़ने वाले ज़्यादातर छात्र इससे वाकिफ़ हैं।

वह आँकड़ा है— 32.9%।

ईसवी सन् 1 में, जब दुनिया नए कैलेंडर की शुरुआत कर रही थी, तब हमारा यह भारतीय उपमहाद्वीप अकेले पूरी दुनिया की कुल कमाई (Global GDP) का लगभग एक-तिहाई यानी करीब 32.9% हिस्सा पैदा करता था। उस दौर में न तो ब्रिटेन की कोई हैसियत थी, और न ही उस रोमन साम्राज्य की जिसके वैभव के किस्से आज यूरोपीय इतिहासकार गाते नहीं थकते (रोमन साम्राज्य का हिस्सा तब करीब 25% से 30% के बीच था)। यहाँ तक कि महाबली चीन भी तब 26% के आसपास ही था।

ज़रा ठहरिए और सोचिए—धरती पर होने वाली कुल आर्थिक गतिविधि का हर तीसरा हिस्सा इसी मिट्टी से उपजता था।

यह कोई काल्पनिक या भावुक राष्ट्रवाद का दावा नहीं है, न ही किसी सोशल मीडिया ग्रुप पर तैरने वाला कोई ‘फॉरवर्डेड’ मैसेज है। यह निष्कर्ष है उस सदी के सबसे महान डच-ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन (Angus Maddison) के जीवनभर के शोध का। मैडिसन ने नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय में अपने जीवन के चालीस साल इसी काम में लगा दिए कि वे सन् 1 से लेकर सन् 1700 तक की दुनिया की तमाम बड़ी सभ्यताओं की अर्थव्यवस्था का दोबारा हिसाब लगा सकें। उनके इस काम को ‘आर्थिक सहयोग और विकास संगठन’ (OECD) ने प्रकाशित किया। आज भी दुनिया भर में आर्थिक इतिहास की जब भी बात होती है, मैडिसन के इस डेटा को सबसे विश्वसनीय और अकाट्य प्रमाण माना जाता है।

आइए, सबसे पहले उस टेबल पर नज़र डालते हैं जिसे इतिहास की मुख्यधारा से लगभग गायब कर दिया गया।

वह टेबल जो हमारी किताबों से गायब कर दी गई

यह तालिका दिखाती है कि समय के साथ दुनिया की कुल कमाई (GDP) में किसका कितना हिस्सा रहा:

वर्ष विश्व GDP में भारत का हिस्सा चीन का हिस्सा पश्चिमी यूरोप का हिस्सा
1 CE 32.9% 26.2% 10.8%
1000 CE 28.9% 22.7% 8.7%
1500 CE 24.4% 25.0% 17.8%
1600 CE 22.5% 29.2% 19.9%
1700 CE 24.4% 22.3% 22.5%
1820 CE 16.0% 32.9% 23.6%
1870 CE 12.2% 17.2% 33.6%
1913 CE 7.6% 8.9% 33.5%
1950 CE 3.8% 4.5% 26.3%

स्रोत: एंगस मैडिसन, The World Economy: A Millennial Perspective (OECD, 2001); The World Economy: Historical Statistics (OECD, 2003)

इस तालिका को ध्यान से देखिए। सन् 1 से लेकर सन् 1700 तक—यानी लगभग 1700 सालों तक—भारत या तो दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति था या फिर दूसरे नंबर पर। यह कोई ऐसा दौर नहीं था जो किसी सुनहरे पल की तरह आया और चला गया। यह इस उपमहाद्वीप का सामान्य हाल था। हमारे पूर्वज लगातार सत्रह शताब्दियों तक दुनिया के आर्थिक इंजन बने रहे।

क्या ये आँकड़े पूरी तरह सटीक हैं? (आलोचकों की राय)

एक ईमानदार लेखक के रूप में हमें सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखना होगा। मैडिसन और उनके बाद के शोधकर्ताओं ने खुद माना है कि सन् 1 या 1700 की अर्थव्यवस्था का बिल्कुल सटीक पैमाना निकालना लगभग असंभव है। उस दौर में आज की तरह कोई सरकारी दफ़्तर नहीं थे जो हर चीज़ का लेखा-जोखा रखें। यह डेटा उस ज़माने के कर-दस्तावेज़ों, आबादी के अनुमानों, खेती की ज़मीन और शहरों के आकार को जोड़कर निकाला गया एक वैज्ञानिक अंदाज़ा है।

‘काटो इंस्टीट्यूट’ (Cato Institute) जैसी संस्थाओं के आलोचकों का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था का आकार इसलिए बड़ा था क्योंकि उस समय दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी इसी उपमहाद्वीप में रहती थी। जहाँ लोग ज़्यादा होंगे, वहाँ उत्पादन भी ज़्यादा होगा।

यहाँ हमें कुल उत्पादन (GDP) और व्यक्तिगत समृद्धि (Per Capita Income) के बीच का अंतर समझना होगा। भारत भले ही दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहाँ का हर आम नागरिक यूरोप के किसी नागरिक से ज़्यादा सुखी या अमीर था। लेकिन इस बहस के बाद भी, मैडिसन के घोर आलोचक भी यह बात स्वीकार करते हैं कि आधुनिक युग (औद्योगिक क्रांति) से पहले भारत और चीन ही दुनिया की दो असली आर्थिक महाशक्तियाँ थीं, और यूरोप इनके सामने बहुत पिछड़ा हुआ था।

महाविनाश: कैसे बिखरा 1700 साल का साम्राज्य?

वर्ष 1700 से 1950 के बीच ऐसा क्या हुआ कि विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 24.4% से गिरकर महज़ 3.8% रह गया? इतिहास के पन्नों में यह गिरावट किसी कुदरती आपदा की तरह नहीं दर्ज है, बल्कि यह एक सोची-समझी योजना का परिणाम थी।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण ने भारत के उस पारंपरिक ढांचे को अंदर से खोखला कर दिया जो सदियों से हमारी ताकत था।

शशि थरूर जैसे मुखर लेखकों से लेकर केंब्रिज के गंभीर अर्थशास्त्री तीर्थंकर रॉय तक, जो ‘लूट’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल बहुत संभलकर करते हैं, इस बात पर सहमत हैं कि भारत के उद्योगों को व्यवस्थित ढंग से नष्ट किया गया।

इसके सबसे बड़े गवाह विनिर्माण (Manufacturing) के आँकड़े हैं:

  • उद्योगों की रीढ़ टूटना: सन् 1750 में दुनिया के कुल विनिर्माण में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25% थी, जो सन् 1900 तक आते-आते महज़ 2% सिमट कर रह गई।
  • व्यापार का एकतरफ़ा होना: सिर्फ बीस सालों के भीतर (1813 से 1833), भारत में ब्रिटेन से आने वाले सूती कपड़ों का आयात 10 लाख पाउंड से बढ़कर 100 लाख पाउंड हो गया। वहीं दूसरी ओर, भारत से बाहर जाने वाले शानदार सूती कपड़ों का निर्यात 13 लाख पाउंड से घटकर सिर्फ 63 हज़ार पाउंड रह गया। जो देश सदियों से दुनिया को कपड़े पहना रहा था, उसे अपने ही बाज़ारों में ब्रिटेन के मिलों में बने कपड़ों का मोहताज बना दिया गया।

                                  वैश्विक विनिर्माण (Manufacturing) में भारत की हिस्सेदारी
                                 
  1750 (स्वदेशी युग)   [██████████████████████████████] 25%
 
  1900 (औपनिवेशिक युग) [██] 2%

 

क्या वाकई 45 लाख करोड़ डॉलर की लूट हुई थी?

भारत से ब्रिटेन की तरफ बहने वाले पैसे (Drain of Wealth) को लेकर इतिहासकारों में एक लंबी बहस है:

  1. दादाभाई नौरोजी ने 1901 में अपनी किताब ‘Poverty and Un-British Rule in India’ में अनुमान लगाया था कि 19वीं सदी के अंत तक हर साल करीब 3 करोड़ पाउंड का धन भारत से बाहर भेजा जा रहा था।
  2. हाल के वर्षों में मशहूर अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने एक बेहद चर्चित और विवादित आँकड़ा दिया। उन्होंने कहा कि 1765 से 1938 के बीच ब्रिटेन ने भारत से लगभग $45 Trillion (45 लाख करोड़ डॉलर) का धन निकाला। उन्होंने भारत के व्यापार अधिशेष को 5% ब्याज दर पर जोड़कर यह हिसाब निकाला था। कई अर्थशास्त्री इस आँकड़े को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर आंका गया मानते हैं, क्योंकि 173 साल का ब्याज जोड़ने से कोई भी राशि काल्पनिक रूप से बहुत बड़ी दिखने लगती है।

लेकिन विवाद संख्या पर है, नीयत पर नहीं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि टैक्स की मनमानी वसूली, व्यापारिक नीतियों में भेदभाव और बिना कोई भुगतान किए भारत के खजाने को ब्रिटेन भेजने की नीति ने भारत की कमर तोड़ दी थी।

इसका सबसे भयानक असर देश की जनता पर पड़ा। 1870 से 1920 के बीच, अंग्रेज़ों के राज में भारत के एक आम नागरिक की औसत उम्र (Life Expectancy) घटकर सिर्फ 27 साल रह गई थी। यह आधुनिक इतिहास में किसी भी बड़ी आबादी के लिए दर्ज की गई सबसे कम औसत उम्र है। इस दौरान देश ने एक के बाद एक कई अकाल झेले। इनमें सबसे बदनाम 1943 का बंगाल का अकाल है, जिसमें लगभग 30 से 40 लाख लोग भूख से तड़पकर मर गए, जबकि औपनिवेशिक सरकार संकट के उन दिनों में भी अनाज का निर्यात करती रही।

आखिर क्या थी भारत के इस आर्थिक वैभव की असली बुनियाद?

दुनिया के उत्पादन का एक-तिहाई हिस्सा पैदा करने के लिए सिर्फ ज़मीन या आबादी काफी नहीं होती। इसके लिए एक बेहद सुदृढ़ और व्यवस्थित तंत्र की ज़रूरत होती है। भारत के पास वह सब कुछ था जो किसी आर्थिक महाशक्ति को चाहिए:

१. सोने की कोख जैसी उपजाऊ खेती

हिमालय से बहकर आने वाली नदियों ने उत्तर भारत के मैदानों को इतनी उपजाऊ मिट्टी दी थी कि किसान साल में दो से तीन फसलें ले लेते थे। दुनिया में शायद ही कोई और इलाका ऐसा था जहाँ इतनी सघन खेती होती थी। यहाँ सिर्फ अनाज ही नहीं उगता था, बल्कि मसाले (काली मिर्च, इलायची, दालचीनी), गन्ना, कपास और नील जैसी नकदी फसलें उगती थीं, जिनकी दीवानी पूरी दुनिया थी।

२. बेजोड़ कारीगरी और तकनीक

भारतीय कपड़े महज़ पहनने की चीज़ नहीं थे, वे विलासिता का प्रतीक थे। हमारे यहाँ की मलमल इतनी बारीक होती थी कि विदेशी उसे ‘बुनी हुई हवा’ कहते थे। इसके अलावा, भारत का ‘वूट्स स्टील’ (Wootz Steel) धातुकर्म की दुनिया का एक अजूबा था। इसी स्टील से मध्य-पूर्व में जाकर मशहूर ‘दमिश्क तलवारें’ बनाई जाती थीं, जिनकी काट का कोई सानी नहीं था।

३. बंदरगाहों का जाल

पश्चिम में सूरत, भरूच, सोपारा और मुज़िरिस से लेकर पूर्व में ताम्रलिप्ति और मछलीपट्टनम तक—भारत के बंदरगाह समुद्री व्यापार के सबसे बड़े केंद्र थे। भारत किसी यूरोपीय नाविक का इंतज़ार नहीं कर रहा था कि वे आकर रास्ता ढूँढें। सच तो यह है कि वे भारत के वैभव से खिंचे चले आ रहे थे।

रोम का कबूलनामा: “हमारा खजाना भारत जा रहा है”

भारत के आर्थिक दबदबे का सबसे पहला और लिखित प्रमाण हमें रोमन साम्राज्य के दस्तावेज़ों में मिलता है। रोमन इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने 77 CE में अपनी किताब ‘Natural History’ में रोते हुए लिखा था:

“रोमन साम्राज्य हर साल भारत, अरब और चीन को मिलाकर 5 से 10 करोड़ सेस्टर्सी (रोमन सिक्के) गँवा रहा है। यह पैसा उन विलासिता की चीज़ों के बदले जा रहा है जो हमारे मर्द और औरतें पहनते हैं।”

यह केवल कागज़ी शिकायत नहीं थी। पुरातात्विक खुदाई में दक्षिण भारत के अरिकमेडु, करूर और मदुरै जैसे इलाकों में रोमन सोने के सिक्कों (Aurei और Denarii) के बड़े-बड़े ढेर मिले हैं। यह इस बात का सबूत है कि रोमन लोग भारत से मसाले, मलमल और रत्न खरीदते थे, लेकिन बदले में भारत को उनसे कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं थी। भारत सिर्फ सोना और चाँदी लेता था।

पहली सदी की एक मार्गदर्शिका ‘Periplus of the Erythraean Sea’ के अनुसार, मिस्र के लाल सागर तट से हर साल करीब 120 जहाज़ भारत के पश्चिमी तट के लिए रवाना होते थे। यह कोई छोटा-मोटा व्यापार नहीं, बल्कि उस दौर का एक विशालकाय उद्योग था।

राजा बदले, हुकूमतें बदलीं, पर तिजोरी नहीं बदली

मौर्य साम्राज्य से लेकर गुप्त, चोल, चालुक्य, विजयनगर और मुगलों तक—दिल्ली और पाटलिपुत्र के सिंहासन पर बैठने वाले चेहरे बदलते रहे, युद्ध होते रहे, साम्राज्य बनते-बिगड़ते रहे, लेकिन भारत का यह आर्थिक इंजन कभी बंद नहीं हुआ।

  • चीनी यात्रियों के दस्तावेज़: 5वीं सदी में फाह्यान और 7वीं सदी में ह्वेनसांग ने भारत के शहरों की जो समृद्धि देखी, उसने उन्हें हैरान कर दिया। ह्वेनसांग ने तो यहाँ के मठों और बाज़ारों की असीम दौलत का पन्ना-दर-पन्ना ब्यौरा लिखा है।
  • अरब यात्रियों की गवाही: 15वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य आए फारसी दूत अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने लिखा, “यहाँ के बाज़ारों में रत्न और हीरे इस तरह खुलेआम बिकते हैं जैसे आम बाज़ारों में अनाज।”
  • मुगल काल का चरम वैभव: सन् 1700 के आसपास, औरंगज़ेब के समय मुगलों का वार्षिक राजस्व संग्रह लगभग 10 करोड़ पाउंड था, जो पूरे यूरोप के राजाओं की कुल कमाई से भी ज़्यादा था।

जब 17वीं सदी में यूरोपीय व्यापारी पहली बार भारत के तटों पर उतरे, तो वे किसी असभ्य या गरीब देश को सुधारने नहीं आए थे। वे धरती के सबसे अमीर इलाके की तिजोरी में हिस्सा माँगने आए थे।

इस इतिहास को हमसे क्यों छुपाया गया?

यह सवाल उठना लाज़मी है कि अगर हमारा इतिहास इतना शानदार था, तो इसे मुख्यधारा की किताबों में वह जगह क्यों नहीं मिली?

इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  1. मैकाले की शिक्षा नीति की विरासत: 1835 में थॉमस मैकाले ने जब भारत की शिक्षा नीति का खाका खींचा, तो उसका एक ही मक़सद था—ऐसे भारतीय तैयार करना जो रंग-रूप से तो भारतीय हों, लेकिन सोच और बुद्धि से अंग्रेज़ों के गुलाम हों। अगर भारतीयों को यह पता चल जाता कि उनके पूर्वज आर्थिक रूप से ब्रिटेन से कहीं आगे थे, तो औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ बगावत बहुत जल्दी हो जाती।
  2. आज़ादी के बाद की नीतियां: आज़ादी के बाद हमारे देश के इतिहासकारों का ध्यान आर्थिक इतिहास से हटकर राजनीतिक एकीकरण और सामाजिक आंदोलनों पर ज़्यादा चला गया। इस वजह से एंगस मैडिसन जैसे महान अर्थशास्त्रियों के काम को अकादमिक दायरों से बाहर निकालकर आम जनता तक नहीं पहुँचाया गया।
  3. अकादमिक संतुलन की कमी: कई बार इतिहास को सिर्फ ‘शोषक और शोषित’ की एक सरल कहानी बनाकर छोड़ दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि 19वीं सदी में यूरोप ने जो वैज्ञानिक और औद्योगिक तरक्की की, उसने भी भारत को पीछे धकेलने में बड़ी भूमिका निभाई। हमें इन दोनों पहलुओं को साथ रखकर देखना होगा।

अंतिम विचार: सोने की चिड़िया पिंजरे में कैसे आई?

32.9% का वह आँकड़ा महज़ एक संख्या नहीं है। यह हमारे पूर्वजों के श्रम, उनकी वैज्ञानिक सोच, उनकी व्यापारिक सूझबूझ और इस मिट्टी की ताकत का दस्तावेज़ है। रोम, अरब और चीन के जहाजों से बहकर आने वाला सोना यहाँ किसी खैरात में नहीं आ रहा था; वह इसलिए आ रहा था क्योंकि भारत के पास वह हुनर था जो दुनिया के किसी कोने में नहीं था।

जब अगली बार कोई आपसे कहे कि भारत हमेशा से एक गरीब देश रहा है जिसे बाहर के लोगों ने सभ्य बनाया, तो उन्हें यह आँकड़ा याद दिलाइएगा। हमें यह समझना होगा कि हमसे क्या लूटा गया, ताकि हम यह जान सकें कि हमारे भीतर फिर से खड़ा होने की कितनी बड़ी क्षमता छिपी है।

यह कहानी केवल पतन की नहीं है, यह एक बार फिर से शिखर की ओर बढ़ने की प्रेरणा है।

संदर्भ और आगे पढ़ने के लिए (Bibliography)

  • Maddison, Angus. The World Economy: A Millennial Perspective. Paris: OECD Development Centre, 2001.
  • Maddison, Angus. Contours of the World Economy, 1–2030 AD. Oxford University Press, 2007.
  • Naoroji, Dadabhai. Poverty and Un-British Rule in India. London: Swan Sonnenschein & Co., 1901.
  • Patnaik, Utsa. “Revisiting the ‘Drain’…” in Agrarian and Other Histories. Columbia University Press, 2017.
  • Roy, Tirthankar. The Economic History of India, 1857–1947. Oxford University Press, 3rd ed., 2011.
  • Pliny the Elder. Natural History, Book VI & XII. Trans. H. Rackham, Loeb Classical Library, 1942.
  • Periplus of the Erythraean Sea. Trans. Wilfred H. Schoff. New York, 1912.
Post Views: 39
  • Twitter
  • WhatsApp
  • Telegram
  • Facebook Messenger
  • Copy Link
  • Facebook
ShareTweetPin
Previous Post

एन.एस.एस स्वयंसेवकों को आकाशीय बिजली, हीट वेव, नशा मुक्ति एवं टीम बिल्डिंग गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया

Next Post

Insulin Weekly Injection Price 2026: भारत में लॉन्च हुआ साप्ताहिक इंसुलिन, जानें कीमत

Related Posts

Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi
आलेख

Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi: कैसे हैदराबाद के एक छोटे से ऑफिस से निकला रॉकेट भारत को अंतरिक्ष की तीसरी महाशक्ति बना गया

July 19, 2026
0
Next Post
Insulin Weekly Injection Price 2026: भारत में लॉन्च हुआ साप्ताहिक इंसुलिन, जानें कीमत

Insulin Weekly Injection Price 2026: भारत में लॉन्च हुआ साप्ताहिक इंसुलिन, जानें कीमत

Ozi News

© 2024 ozinews.in - Powered by Ozi Broadcasters Private Limited+919317088800

Navigate Site

  • HOME
  • BREAKING
  • PUNJAB
  • HARYANA
  • INDIA
  • WORLD
  • SPORTS
  • ENTERTAINMENT
  • CAREER
  • EDUCATION
  • DHARAM
  • CONTACT US

Follow Us

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • HOME
  • BREAKING
  • PUNJAB
  • HARYANA
  • INDIA
  • WORLD
  • SPORTS
  • ENTERTAINMENT
  • CAREER
  • EDUCATION
  • DHARAM
  • CONTACT US

© 2024 ozinews.in - Powered by Ozi Broadcasters Private Limited+919317088800