Skyroot Aerospace Vikram 1 in Hindi
प्रस्तावना: 15 मिनट जिन्होंने भारत का इतिहास बदल दिया
18 जुलाई 2026, रात के ठीक 12:05 बजे। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के पैड-1 पर सन्नाटा है, बस काउंटडाउन की आवाज़ गूंज रही है। हैदराबाद में एक कंट्रोल रूम में कुछ लोग सांस रोके बैठे हैं — इनमें वो दो लोग भी हैं जिन्होंने आठ साल पहले ISRO की पक्की सरकारी नौकरी छोड़कर एक ऐसा सपना देखा था जिस पर उस वक्त शायद ही किसी को पूरा भरोसा था।
फिर ज़मीन कांपती है, आग और धुएं का एक विशाल गुबार उठता है, और 22 मीटर लंबा एक रॉकेट आसमान की तरफ दहाड़ता हुआ निकल जाता है। अगले 15 मिनट किसी भी स्टार्टअप के इतिहास के सबसे लंबे 15 मिनट होते हैं। स्टेज सेपरेशन… सफल। दूसरी स्टेज इग्निशन… सफल। तीसरी स्टेज… सफल। और फिर वो पल आता है जिसका पूरे देश को इंतज़ार था — पेलोड को 450 किलोमीटर की ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया जाता है।
कंट्रोल रूम में तालियां गूंजती हैं। कमेंटेटर की आवाज़ में जो जज़्बात हैं, वो शब्दों से ज़्यादा साफ बोलते हैं: “It is the dawn of a new space era.”

यह था Mission Aagaman — Skyroot Aerospace के Vikram-1 रॉकेट की पहली ऑर्बिटल उड़ान। इस एक लॉन्च के साथ भारत दुनिया का सिर्फ तीसरा देश बन गया — अमेरिका और चीन के बाद — जिसकी कोई प्राइवेट कंपनी अपने दम पर किसी सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर सकती है। सरकारी ISRO नहीं, बल्कि एक प्राइवेट कंपनी, जो कभी सिर्फ 10 लोगों की एक छोटी टीम थी।
Skyroot ने इस पल को X (पूर्व में ट्विटर) पर एक लाइन में समेटा: “Hello space, we have arrived!”
लेकिन असली कहानी इस एक रात से कहीं ज़्यादा गहरी है। यह कहानी है दो इंजीनियरों की जिन्होंने अपनी सुरक्षित नौकरियां छोड़ दीं, एक कॉलेज की सीढ़ियों पर बंधी दोस्ती की, एक कोल्ड ईमेल की जिसने सब कुछ बदल दिया, और आठ साल की उस मेहनत की जो कोविड, फंडिंग की कमी और भारत के सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग चैलेंजों के बावजूद कभी नहीं रुकी।
भाग 1: दो लड़के, दो अलग रास्ते, एक जैसा जुनून
पवन कुमार चंदना — गणित में 51 नंबर वाला लड़का
कहानी शुरू होती है हैदराबाद के एक साधारण मध्यमवर्गीय घर से। पवन कुमार चंदना बचपन से मशीनों और उनके भीतर छिपी टेक्नोलॉजी को लेकर उत्सुक रहते थे, लेकिन स्कूल में गणित उनकी सबसे कमज़ोर कड़ी थी। एक परीक्षा में उन्हें सिर्फ 51 नंबर मिले — बस पास होने लायक, फेल होने से बचने भर के। जो लड़का कभी शर्मिंदा होता था अपने मार्क्स से, आज वही इंसान ऑर्बिटल मैकेनिक्स, थ्रस्ट वेक्टर्स और स्टेजिंग सीक्वेंस जैसे भारत के अब तक के सबसे जटिल गणितीय कैलकुलेशन को हकीकत में उड़ता देख रहा था।
चंदना ने हार नहीं मानी। मशीनों के प्रति उनका जुनून उन्हें आगे खींचता रहा, और उन्होंने पहले ही प्रयास में IIT एंट्रेंस एग्ज़ाम क्लियर कर लिया और IIT खड़गपुर में दाखिला लिया। जहां ज़्यादातर इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स ऊंची तनख्वाह वाली टेक इंडस्ट्री की नौकरियों की तरफ भागते हैं, चंदना का दिल रॉकेट्स और स्पेस में बसा था। यही जुनून उन्हें सीधे कैंपस से ISRO तक ले गया।
तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में छह साल तक उन्होंने रॉकेट डिज़ाइन और डेवलपमेंट पर काम किया, इस दौरान उन्हें एक इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड भी मिला। लेकिन उनके मन में एक सवाल हमेशा कुल्बुलाता रहा — अगर अमेरिका में SpaceX जैसी प्राइवेट कंपनियां रॉकेट बना सकती हैं, तो भारत में क्यों नहीं?
नागा भरत डाका — एवियोनिक्स का जादूगर
दूसरी तरफ थे नागा भरत डाका — IIT बॉम्बे से पढ़े, और माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स व VLSI डिज़ाइन में मास्टर्स की डिग्री IIT मद्रास से। ISRO में वे एक फ्लाइट कंप्यूटर इंजीनियर थे, जहां उन्होंने भारत के लॉन्च वीइकल्स के लिए कई क्रिटिकल एवियोनिक्स मॉड्यूल डिज़ाइन किए — वो सिस्टम जो किसी रॉकेट को “दिमाग” देते हैं, उसे बताते हैं कब मुड़ना है, कब स्टेज गिरानी है, कब इंजन जलाना है।
चंदना और डाका, दोनों ISRO में मिले, दोनों में एक जैसी बेचैनी थी। दोनों जानते थे कि भारत के पास टैलेंट की कमी नहीं — कमी थी एक ऐसी सोच की जो सरकारी सुस्त रफ्तार से हटकर स्टार्टअप की स्पीड से रॉकेट बनाए।
भाग 2: Skyroot Aerospace in Hindi – एक कोल्ड मैसेज जिसने सब कुछ बदल दिया
जून 2018 में, चंदना और डाका ने ISRO की स्थायी और सम्मानजनक नौकरी छोड़ दी और हैदराबाद में Skyroot Aerospace की नींव रखी। यह फैसला जितना साहसी था, उतना ही जोखिम भरा भी — उनके पास न कोई बिज़नेस बैकग्राउंड था, न इन्वेस्टर नेटवर्क, और न ही यह गारंटी थी कि भारत सरकार कभी प्राइवेट कंपनियों को रॉकेट बनाने की इजाज़त देगी भी या नहीं।
चंदना के पास बस एक चीज़ थी जो काम आ सकती थी — IIT खड़गपुर की एलुमनाई डायरेक्टरी, और एक LinkedIn अकाउंट। उन्होंने एक साथी IIT खड़गपुर ग्रेजुएट को कोल्ड मैसेज भेजा — मुकेश बंसल, जो Myntra, CureFit और NuRX जैसी कंपनियों के फाउंडर थे। बंसल ने भरोसा किया और $1.5 मिलियन का सीड फंडिंग दे दिया।
लेकिन किस्मत ने तुरंत एक और इम्तिहान भेजा — कोविड-19 महामारी। पूरी दुनिया थम गई, और इसके साथ ही आगे की फंडिंग भी जम गई। यह वो दौर था जब कई स्टार्टअप्स दम तोड़ देते हैं। लेकिन इसी मुश्किल घड़ी में रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी Greenko के फाउंडर्स आगे आए और कंपनी को टिकाए रखने में मदद की।
लगभग उसी समय, मई 2020 में, भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। तत्कालीन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया: “भारतीय प्राइवेट सेक्टर भारत की स्पेस यात्रा में सह-यात्री होगा।” इसी के साथ जून 2020 में IN-SPACe की स्थापना हुई। भारत का स्पेस सेक्टर आखिरकार दशकों की सरकारी जकड़न से बाहर निकल रहा था, और Skyroot इस नई लहर की सबसे आगे की टीम में शामिल थी।
स्काईरूट एयरोस्पेस के बारे में अधिक जानने के लिए उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ।
भाग 3: 10 लोगों की टीम से लेकर रॉकेट साइंस तक — कदम दर कदम
Skyroot ने कभी भी एक झटके में बड़ा दांव नहीं लगाया। उन्होंने हर टेक्नोलॉजी को छोटे-छोटे कदमों में साबित किया:
- जुलाई 2020: कंपनी ने अपने पहले इंजन का टेस्ट किया — Raman-1 (सी.वी. रमन के सम्मान में)।
- 22 दिसंबर 2020: भारत की पहली प्राइवेट-निर्मित सॉलिड रॉकेट स्टेज का सफल टेस्ट फायर हुआ — Kalam-5। इसका कार्बन-कम्पोज़िट स्ट्रक्चर पूरी तरह ऑटोमेटेड प्रोसेस से बनाया गया था, जिसने स्टील के मुकाबले पांच गुना तक वज़न बचाया।
- 19 मई 2022: Kalam-100 इंजन का फुल-ड्यूरेशन टेस्ट पूरा हुआ।
- 18 नवंबर 2022: Vikram-S, भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट, “Mission Prarambh” के तहत सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ। इसने साबित कर दिया कि एक भारतीय प्राइवेट कंपनी सच में रॉकेट उड़ा सकती है।
- अगस्त 2025: कंपनी ने Kalam-1200 का टेस्ट-फायर किया — भारत का अब तक का सबसे बड़ा प्राइवेट रूप से विकसित सॉलिड रॉकेट बूस्टर।
- 18 जुलाई 2026: चार साल की मेहनत के बाद, वही टीम Skyroot Aerospace Vikram 1 को पूरी पृथ्वी की कक्षा तक ले गई।
भाग 4: Vikram-1 के अंदर — यह रॉकेट काम कैसे करता है?
Vikram-1 सीरीज़ की सबसे बड़ी खासियत है इसका पूरी तरह कार्बन-फाइबर स्ट्रक्चर, जो इसे परंपरागत स्टील और एल्युमिनियम रॉकेट्स के मुकाबले काफी हल्का बनाता है।
टेक्निकल स्पेसिफिकेशन्स:
- ऊंचाई: करीब 22 मीटर (72 फीट)
- स्टेज: तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज, प्लस एक लिक्विड-फ्यूल्ड “किक स्टेज” (सैटेलाइट को सटीक ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए)
- पेलोड क्षमता: 500 किमी की सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में 290 किग्रा, या 45° इनक्लिनेशन वाली लो-अर्थ ऑर्बिट में 480 किग्रा तक
- असेंबली-टू-लॉन्च टाइम: भविष्य में लक्ष्य है सिर्फ 72 घंटों में असेंबली और लॉन्च।
(रॉकेट लॉन्च का रोमांचक वीडियो नीचे देखें)
भाग 5: पैसा, भरोसा और यूनिकॉर्न का ताज
रॉकेट साइंस सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं है — यह करोड़ों डॉलर की पूंजी का खेल भी है। Skyroot की फंडिंग यात्रा शानदार रही है:
- 2019: सीड राउंड में ₹17.5 करोड़ जुटाए।
- सितंबर 2022: $51 मिलियन का Series B राउंड (सिंगापुर की GIC के नेतृत्व में)।
- अक्टूबर 2023: $27.5 मिलियन का pre-Series C राउंड।
- मई 2026: सबसे बड़ा धमाका — $60 मिलियन का Series C राउंड। इस राउंड के साथ Skyroot की कुल फंडिंग $160 मिलियन के पार पहुंच गई और कंपनी की वैल्यूएशन $1.1 बिलियन हो गई — जिससे यह आधिकारिक रूप से भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन गई।
भाग 6: अकेले नहीं हैं — भारत की नई स्पेस रेस
Skyroot की कहानी अकेली नहीं है। Agnikul Cosmos, Dhruva Space, Bellatrix Aerospace और Pixxel जैसी कंपनियां भी इस इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। भारतीय स्पेस एसोसिएशन (ISpA) के मुताबिक, 2020 में सेक्टर के उदार होने के बाद से अब तक $600 मिलियन से ज़्यादा का निवेश आ चुका है, और देश में 100 से ज़्यादा स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं।
भारत के अन्य सफल स्टार्टअप्स की कहानी यहाँ पढ़ें।
भाग 7: यह क्यों मायने रखता है — सिर्फ एक रॉकेट नहीं, एक बदलाव की शुरुआत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि यह सफलता “देश के अनगिनत युवाओं को बड़े सपने देखने और निडर होकर इनोवेट करने के लिए प्रेरित करेगी।”
ग्लोबल कॉन्टेक्स्ट: Vikram-1 की सफलता भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा (जैसे SpaceX और Rocket Lab के खिलाफ) में एक असली दावेदार के तौर पर स्थापित करती है।
आर्थिक अवसर: Skyroot की योजना FY32 तक अपने रेवेन्यू को ₹13,205 करोड़ तक ले जाने की है।
भाग 8: आगे क्या?
- Vikram-1 की दो और डेवलपमेंट फ्लाइट्स होंगी।
- 2027 तक पूरी तरह कमर्शियल ऑपरेशंस शुरू करने का लक्ष्य है।
- अगला बड़ा कदम होगा Vikram-2 का लॉन्च — क्रायोजेनिक अपर स्टेज के साथ, जो ज़्यादा भारी पेलोड ले जाने में सक्षम होगा।
समापन: सपनों की कोई गुरुत्वाकर्षण सीमा नहीं होती
Vikram-1 सिर्फ एक टेक्निकल उपलब्धि नहीं है — यह इस बात का प्रमाण है कि अगर भारत के युवा इंजीनियरों को सही नीतिगत माहौल और भरोसा मिले, तो वे दुनिया की सबसे मुश्किल तकनीकों में भी अपनी जगह बना सकते हैं।
पवन चंदना का सफर हमें याद दिलाता है कि शुरुआती नंबर कभी मंज़िल तय नहीं करते। भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर अभी अपने बचपन में है, लेकिन Skyroot Aerospace Vikram 1 ने साबित कर दिया है कि यह बचपन बहुत जल्दी परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है। अंतरिक्ष अब सरकारी फाइलों का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा सपना है जिसे हकीकत में बदला जा सकता है।












