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शहीद भगत सिंह के जन्मदिन पर विशेष: ‘खून से लथपथ धरती से क्रांति तक का सफर

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September 28, 2021
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पटियाला, 28 सितम्बर (प्रेस की ताकत बयूरो)- भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907, दिन शनिच्चरवार को स्वभाव पौने नौ बजे, लायलपुर (फैसलाबाद, अब पाकिस्तान) ज़िलो के गाँव बंगा ( चक्क नं: 105) में हुहैं। उसके दादे स. अर्जन सिंह ने 1899 के नज़दीक -डरार, ज़िला जालंधर / नवांशहर बीच वाले अपने जद्दी गाँव खटकड़ कलाँ से प्रवास करन का फ़ैसला कर लिया था। वास्तव में, उस समय पर अनेकों किसान पूर्वी पंजाब से पश्चिमी पंजाब में जा बसे थे, क्योंकि उन की आँखें वहाँ से नहरी कलोनियों की ज़रखेज़ और अनछुआ पड़ी ज़मीन पर ललचाईं हुई थीं, जो अब नयी उखाड़ी गई नहरों द्वारा सींची जाएँ लग पड़ी थी।

सामाजिक उथल पुथल और भगत सिंह के परिवार को देश से निकलना
सरदार अर्जन सिंह एक आर्य सामाजिक था। कांग्रेस का एक सक्रिय मैंबर होने के इलावा वह रूढ़िवादी सामाजिक विचारों, गन्ने का रस -रीतों और ख़ास करके जाति -पात का कट्टर विरोधी था। इस करके, यह कोई हैरानी की बात नहीं थी कि उसके तीनों ही पुत्र स. किशन सिंह – भगत सिंह का पिता, स. अजीत सिंह और स. स्वर्न सिंह, आज़ादी संघर्ष की गर्म -बेकार धारा में शामिल हो गए। शहीद का जन्म -साल 1907, पंजाब में राजसी उथल -पुथल का साल था। राष्ट्रीय स्तर’पर, 1905 में हुई बंगाल की बाँट, इस हिलजुल का कारण बनी और पंजाब के लिए इस का आधार’पंजाब कोलोनाईजेशन एक्ट’बने। इस एक्ट के द्वारा हकूमत, नहरी कलोनियों में आबाद हुए किसानों से, उन की भोइं की मालकी के हक छीन लेना चाहती थी, वह भोइं, जो उन कड़ी घालना साथ जान मारकर जोती हुई -योग्य बनाई थी। डोर -भौंरा हुए किसान अपने अकड़कर हुए आत्माभिमान को गाँठ मारने के लिए’पगड़ी संभाल ओ जाट’गाने लग पड़े। जिस तरह कि उम्मीद ही थी, स. अर्जन सिंह का परिवार इस आंदोलन की अगुआ चटाईयों में आने डटा, जिसका नतीजा यह हुआ कि स. किशन सिंह को नेपाल का देश -निकाला, स. अजीत सिंह को बरमों की जला -देशवासी और स. स्वर्न सिंह को कैद हो गई। शहीद का जन्म शुभ नक्षत्रों में, उन तीनों के वापस लौटने की ख़बर के साथ हुआ और उसका छोटा -नाम भागांवाळा रखा गया, जो बाद में भगत सिंह हो गया, वह नाम, जिसने एक लोग -गाथा बनना था। विधमाता बच्चे को देख कर मुस्कुराई परन्तु एक अलग ही अंदाज़ में !

भक्त सिंह का बचपन
भगत सिंह, जब अजय वह बच्चा ही था तो वह घर में अपनी, दो बेसहाराे चाचियाँ को देखता – माता हरनाम कौर, यह स. अजीत सिंह की पत्नी थी – जिसको देश निकाला कर दिया गया था और किसी को उसके जीता होने का यकीन भी नहीं था और माता हुक्म कौर, स. स्वर्न सिंह की घरवाळी था, जो 1910 में केवल 23 सा सालों की भर जवानी में जेल में ही अकाल प्रस्थान कर गया था। वह दोनों लड़के से जान छिड़कतीं थे, जिसने उस छोटी सी उम्रे भी उन की आतमों की गहरी उदासी की थाह डाल के लिए थी। मर्ज़ को पहचानने में कोई बहुत समय न लगा और उसने बिल्कुल उचित पहचान की कि इस बीमारी की जड़ विदेशी का अत्याचारी साशन है। अक्सर ही, वह स्कूल से पढ़ कर आता तो बहुत मासूमियत साथ अपनी चाची हरनाम कौर को पूछता कि क्या चाचा जी की कोई चिट्ठी आई है? वह यह नहीं थी जानता कि इस सवाल साथ चाची के मन में जज़बातों का जुआलामुखी उबलने लग पड़ेगा। जवाब देने से असमर्थ, चाची के चेहरो के उदास हाव -भाव देख कर वह तड़क भड़क उठता और पूरे जोश में आ कर बोलता कि जब वह बड़ा हो गया, तो हिन्दोस्तान को आज़ाद कराने के लिए वह बंदूक ले कर अंग्रेज़ों साथ लड़ेगा और अपने चाचे को वापस लायेगा। मज़लूमें साथ हमदर्दी और ज़ालिमों के ख़िलाफ़ गुस्सा, उसके दिल की डूंघाना में बैठ गया क्योंकि उनके घर 1914 -15 के चितकबराे समेत हर तरह के गर्म -ख़्यालियों का आना -जाना लगा रहता था। उन में से नौजवान नायक करतार सिंह सराभा, उसका आदर्श बन गया।

वह हालात जिन्होंने भगत सिंह को क्रांतिकारी बनाया
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के बधाई दिहाड़े, अमृतसर में जल्हआंवाळे बाग़ के शौर्यगाथा ने देश को पराकाष्ठा -अंदर तक हिला कर रख दिया। नौजवान भगत सिंह, 14 अप्रैल को उस ख़ूनी जगह पर जानो न रुक सका और वहाँ से, उसने लहु -भीगी मिट्टी उठा कर सारी उम्र के लिए एक निशानी के तौर पर संभाल के लिए। उस दिन वह स्कूल ( लाहौर) जाने की बजाय सीधा अमृतसर गया। वहाँ से शाम को वापस आते काफ़ी कुवेळा हो गया तो बुरी तरह घबराऐ और बेचैन हुए पारिवारिक सदस्यों के साँस सूखे रहे। ख़ून की इस होली साथ, हमारे आज़ादी -संग्राम के इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन तो आया ही, बल्कि शहीद की ज़िंदगी में भी यह एक तीखा मोड़ साबित हुई। इस से सिर्फ़ दो सालों बाद ख़ून की एक ओर होली, पहले सिक्ख गुरू, श्री गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान, गुरुद्वारा श्री ननकाना साहब में खेली गई, जब 20 फरवरी 1921 को लगभग 150 निहत्थे सिक्ख श्रद्धालू कत्ल कर दिए गए और उन की लाशें को मिट्टी का तेल छिड़क कर जला दिया गया। चाहे कि साफ़ तौर पर यह एक धार्मिक मामला था परन्तु इसका एक राजनैतिक पहलू भी था। वास्तव में, यह नर -संहार बदमाश और दुराचारी महंतों द्वारा किया गया था, जो गुरुद्वारों का प्रबंध चलाते थे और धार्मिक असथानों के नाम बे आस -थाह ज़मीन -जायदाद का दुरुपयोग करते थे। सिक्ख, उन महंतों को अधर्मी मानते थे और उन को गुरुद्वारों में से बाहर निकालने के लिए एक गुरुद्वारा सुधार लहर चलाई गई परन्तु हकूमत महंतों की पीठ दबा रही थी। भगत सिंह, जब 5मार्च 1921 को वहाँ रखी गई एक बहुत बड़ी कान्फ्रेंस में शामिल होने के लिए, ननकाना साहब गया तो वह एक बार फिर पराकाष्ठा -अंदर से झंझोड़ा गया। वहाँ से वह, उन बे आस -रहम हत्याएँ भी याद में बनाया गया एक कैलंडर ले कर वापस आ गया।

भाषायों का ज्ञान और गुरबानी सीखने का जज़बा
हकूमत के विरोध और न -फ़ुरमानी के चिह्न के तौर पर, उसने भी बाकी सिक्खों की तरह काली पगड़ी बाँधनी शुरू कर दी। इस के इलावा श्री गुरु ग्रंथ साहब का पाठ करन के लिए पंजाबी / गुरमुखी सिक्खनी भी शुरू कर दी, जिस को प्राचीन समय से ही धार्मिक और सच्चा सिक्ख गुरू ग्रंथ साहब का पाठ करन के लिए बड़ी संख्या में सिक्खदे रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि भगत सिंह पहले ही उर्दू, हिंदी और संस्कृत में अच्छी महारत हासिल कर चुका था, बल्कि अंग्रेज़ी सीखने के लिए बाद में उसको काफ़ी मेहनत करनी पड़ी थी। फिर भी, जब उसने’कामगार’रसाले ली लेख -लड़ी -जितना में ज्यादातर शहीदों की जीवनियाँ होती थीं -लिखनीं शुरू की तो पहले पंजाबी सिक्खी हुई होने के कारण, उस के लिए बड़ा आसान रहा। इस के बाद उसने, गांधी की द्वारा दिए गए न -सहयोग लहर के बुलाऐ’और, लाहौर का डी.ए.वी स्कूल छोड़ दिया। न -सहयोग लहर दौरान गांधी जी ने विद्यार्थियों से अपील की थी कि वह, हकूमत से सहायता -प्राप्त या मान्यता -प्राप्त संस्थायों को छोड़ कर नेशनल स्कूलों / कालेज में दाख़िल हो जाएँ। भगत सिंह -जो अजय नौवीं जमात में ही थी -भी नेशनल कालेज लाहौर में दाख़िला लेना चाहता था, जिस के लिए उसको दाख़िले से पहले एक इम्तिहान के पास करना पड़ना था, जो उसने के पास कर लिया।

शिक्षा और गुपतवास
इस कालेज में पढ़ते वह सुखदेव, भगवती चरण वोहरा, यशपाल और कुछ ओर दोस्तों के संपर्क में आया। यह दोस्त उसके भविष्य के साथी थे। पाठ -कर्म, पुस्तकालय की पुस्तकें और अध्यापकों समेत, कालेज का पूरा माहौल इस ढंग साथ सृजन करा गया था कि विद्यार्थियों में गर्म -ख़्याल राजसी चेतनें को मौज मस्ती मिले। भगत सिंह एक गंभीर पाठक बन गया, यह गुण उसके स्वभाव का मानो दूसरा पहलू था।ऐफ़. ए. का इम्तिहान के पास करन से तुरंत बाद ही उसकी कालेजी -पढ़ाई रुक गई। वह घर आ गया क्योंकि घरदे उसका विवाह करन के लिए ज़िद्दी थे। यह साल 1923 के पिछले अर्ध की बात है। उसने अपने परिवार से अलग हो कर करीब 6महीने कानपुर गुज़ारे, जहाँ उसने एक मशहूर राष्ट्रवादी और’प्रताप’अख़बार के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी से पत्रकारिता की कला सिक्खनी आरंभ की और काकोरी ग्रुप के नाम साथ मशहूर, हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन साथ अपने प्राथमिक संपर्क स्थापित किये। वह सक्रिय इंकलाबी लहर में कूद पड़ा और बाद में सुखदेव के सहयोग साथ, पंजाब में हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की इकाई कायम करन में पूरी सक्रियता साथ शामिल हो गया।

क्रांतिकारी सरगरमियां के शुरू में, घर वापस आने से तुरंत बाद अप्रैल 1924 में उसको छिपा हुआ होना पड़ा। वजह यह था कि जैतो के मोर्चो के सम्बन्ध में 500 सत्याग्रहियों का एक बड़ा जत्था गुरुद्वारा गंगसर को जा रहा था ; जब यह जत्था लायलपुर ज़िलो के गाँव बंगा ( चक्क नं: 105) में दोपहर के समय रुका तो भगत सिंह ने अपने साथियों साथ रळ कर, उन के लिए लंगर का प्रबंध किया था। वह दिसंबर 1925 तक छिपा हुआ रहा। इस समय दौरान वह ज़्यादातर दिल्ली या यू.पी. में रहा। 1926 के आधार में ही उसने राम चंद्र, भगवती चरण वोहरा, सुखदेव और ओर साथियों साथ रळ कर’नौजवान भारत सभा’बना के लिए। क्रांतीकारियें के लिए यह संस्था एक खुला और जनतक मंच था। यह संस्था समाज सुधार और सांप्रदायिक सदभावनों के एक विशाल उद्देश्य को परनायी हुई थी।

जब वह इंकलाबी सरगर्मियों में पूरी तरह रुझ्या हुआ था, तो उसको 29 मई 1927 को लाहौर पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया और 4जुलाई 1927 तक हिरासत में रखा। फिर उसका पिता स. किशन सिंह 60000 रुपए का मुचलका भर कर उसको ज़मानत पर रहा करवाने में कामयाब हो गया। भगत सिंह को, अपने परिवार के बाकी जीवों को मिलने से पहले ही उसके पिता ने खूंडे साथ पीटा और वह मख़ौल करता और दाँत निकालता रहा। उन दिना में ज़िद्दी पुत्रों साथ ऐसा व्यवहार आम होता था।

सांडर्स का कत्ल -9सितम्बर 1928 को दिल्ली में एक नयी जत्थेबंदी बनाई गई, जिसका नाम हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन / आर्मी रखा गया। एक इंकलाब के द्वारा भारत को समाजवादी गणराज्य बनाना, इसका निशानों था।हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने 17 दिसंबर 1928 को, सहायक पुलिस सुपरडैंट जे.पी.सांडरस को मार कर, पहली बड़ी कार्यवाही की। सांडर्स के लाठी -प्रभार साथ ही लाळा लाजपत राय ज़ख़्मी हुए थे, जिस करके उन की मौत हो गई थी। हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की तरफ से एक इश्तिहार जारी किया गया, जिस में उन कत्ल की ज़िम्मेदारी कबूल की और जहाँ तक संभव हो सके’मानवीय ख़ून वहाउण’से बचते, इंकलाब में अपने विसवाश का ऐलान किया।

असेंबली में बम मारना
तिन्न महीनों बाद में 1929 के शुरू में, आगरे में एक जलसा हुहैं। 8अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बी.के. दत्त ने केंद्रीय असेंबली में दो बम फेंके। यह बम किसी को जानी नुक्सान पहुँचाने के मकसद साथ नहीं थे फेंके गए। उन्हों ने पुलिस को अपनी गिरफ़्तारी दे दी। धमाके बाद फिर इश्तिहार फेंके गए, जितना में यह ऐलान था कि यह सिर्फ़’बोळी हकूमत’के कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए किया गया है। उन्हों ने मुकदमे दौरान अदालत में एक लंमें -चौड़ा बयान दिया। इस में उन इंकलाब और धमाके बाद लगाऐ गए नारे इंकलाब ज़िंदाबाद -जो पूरे मुल्क में गूँज उठा था -के संकल्प को बयान किया। जल्दी ही, उसके ज़्यादातर साथी गिरफ़्तार कर लिए गए। हालाँकि भगत सिंह और बी. के. दत्त को पहले ही उम्र कैद हो उठाई हुई थी परन्तु उन्हों ने लाहौर साज़िश केस अधीन अपने ओर साथियों समेत एक ओर मुकदमो का सामना भी करना था।

जेल का सफ़र
जेल में होते, मानववादी व्यवहार को अपने अधिकार के तौर पर सिद्ध करन के लिए, उन को दो महीनों से भी ज़्यादा लंबे समय के लिए भूख हड़ताल करनी पड़ी। इस संघर्ष दौरान, उन को अपने एक प्यारे साथी और बम बनाने के माहिर जतीन दास की बलि भी देनी पड़ी। फिर कहीं जाकर, वह लोगों की हार्दिक हमदर्दी प्राप्त करन में कामयाब हुए।

उन मुकदमो का सामना किया, बल्कि यह कह लो कि इंकलाबी नारे मारते उन मुकदमो का आनंद माना। वह’मई दिवस’,’लैनिन दिवस’,’काकोरी दिवस’और ऐसे ओर कई सभी’दिवस’मना कर, इस मुकदमे के जश्न मनाउंदे थे। अदालती कार्यवाहियों दौरान अपने’बचाव’में उन की रूचि बहुत कम थी, बल्कि उन का निशानों सिर्फ़ इस सभी मामले को एक ड्रामे के तौर पर नंगा करन का था। आखिर उन में से तीनों भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सज़ा हुई और बाकियों को उम्र कैद हो गई। मुकदमो के फ़ैसले की तारीख़ 7अक्तूबर 1930 से 23 मार्च 1931 तक, कुछ लोग -हितकारी दलेर वकीलों द्वारा भारत और इंग्लैंड की पृवी कौंसिल में अनेकों अपीलों की गई। इन में से एक अपील मुलजिमों की तरफ से नहीं थी की गई। यह सभी अपीलों कानूनी नुक्तों पर अधारित थे।

फांसी का रस्सा चुंमणा
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू ने 20 मार्च 1931 को पंजाब के गवर्नर को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में उन विनती की कि उन को फांसी लाने की बजाय फ़ौजी दस्ते की तरफ से गोली साथ उड़ाया जाये क्योंकि उन को इंग्लैंड के शहनशाह के ख़िलाफ़’जंग छेड़नो’के दोषी ठहराया गया है, इस करके वह जंगी कैदी हैं।

आखिर, हकूमत ने उन को 23 मार्च 1931 को शाम 7:00 बजे (24 मार्च स्वभाव की बजाय) फांसी लाने का फ़ैसला कर लिया परन्तु यह ख़बर 24 मार्च की स्वभाव को प्रसारित की जानी थी। 23 मार्च को, शहीदों के परिवारों को आधिकारियों के अड़ियल व्यवहार के कारण, अपने बिछड़ रहे प्यारों को आखिरी बार मिलने का मौका भी न मिल सका। वह नारे मारते, देश -भक्ति के गीत गाते और मौत और न्यायहीन फ़ैसला सुनाने वाले निज़ाम का मुँह चिड़ाउंदे हुए फांसी के तख़्ते पर जा चढ़े।

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