माला दीक्षित, नई दिल्ली- मध्य प्रदेश के नये कानून ने महिला सुरक्षा से जुड़े कानूनों की समीक्षा पर एक बार फिर बहस ताजा कर दी है। महिलाओं के प्रति बढ़ते यौन अपराध और छोटी बच्चियों को हवस का शिकार बनाए जाने के अपराधों पर लगाम लगाने के लिए प्रदेश सरकार ने भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) में संशोधन किया है। जिसमें 12 वर्ष तक की आयु की लड़की से दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान है। मध्य प्रदेश का यह कानून फिलहाल राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केन्द्र के समक्ष विचाराधीन है। सवाल है कि यह सिर्फ मध्यप्रदेश का मामला है या पूरे देश का हाल। अगर केंद्र इसे मंजूरी देता है तो क्या आगे चलकर वह खुद आईपीसी को संशोधित करेगा ताकि पूरे देश के लिए समान कानून हो और छोटी बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों को मौत की सजा दी जा सके।देश के जानेमाने वकील और पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी कहते हैं कि यदि केन्द्र सरकार इसे मंजूरी देती है तो इसका मतलब है कि वह मानती है कि छोटी बच्चियों की सुरक्षा के लिए ऐसे कड़े कानून की जरूरत है। आईपीसी केन्द्रीय कानून है सामान्य तौर पर ये सभी राज्यों के लिए समान होनी चाहिए।केन्द्र सरकार को स्वयं उसमें संशोधन कर पूरे देश में लागू करना चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या छोटी बच्चियों को दुष्कर्मियों से बचाने में फांसी का भय कारगर हो पाएगा। क्या यह कानून विरले मामलों में फांसी देने के सिद्धांत को पार कर बच्चियों की सुरक्षा का उद्देश्य पा सकेगा। क्योंकि दिल्ली में जब चलती बस मे सामूहिक दुष्कर्म की घटना घटी थी तो उस वक्त दुष्कर्मियों को फांसी देने की मांग ने जोर पकड़ा था। जनता के दबाव में इस पर विचार हुआ और दुष्कर्म में अति वहशीपन व क्रूरता पर फांसी की सजा का भी प्रावधान किया गया लेकिन छोटी बच्चियों को हवस का शिकार बनाने वालों के लिए तब भी मौत की सजा तय नहीं हुई थी। बच्चों का यौन उत्पीड़न रोकने के लिए विशेष तौर पर लाये गये पोक्सो कानून में भी मौत की सजा नहीं है। ऐसे में मध्य प्रदेश का कानून छोटी बच्चियों की सुरक्षा को लेकर नयी बहस को जन्म देता है। प्रदेश सरकार ने कानून के उद्देश्य में कहा है कि स्त्रियों के विरुद्ध यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म के अपराध बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं।
