इस फिल्म कटरीना कैफ और विजय सेतुपति लीड रोल में है. दोनों पहली बार पर्दे पर एक साथ नजर आने वाले हैं. जब श्रीराम राघवन की लेटेस्ट रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘मेरी क्रिसमस’ (उन्होंने क्रेडिट्स के वक़्त ‘मेरी’ को ‘मैरी’ लिखवाया है, उनकी मर्ज़ी) देखके निकला तो दिमाग में सबा अकबराबादी (1908-1991) का एक कलाम चल रहा था.
फिल्म शुरू होती है ये बताते हुए कि कहानी अभी की नहीं है. हम कुर्सी में ख़ुद को थोड़ा और धांस देते हैं. कहानी तब की है जब अभी की मुंबई को बॉम्बे कहा जाता था. और इस बात की तस्दीक होती है पीसीओ में डाले जा रहे अशोक स्तम्भ के 3 शेरों वाले एक रुपये के सिक्के से, वजन मापने वाली डिस्को लाइट से लैस मशीनों के विज़ुअल से, ट्रेन के टिकस (पढ़ें टिकट) के पीछे फ़िल्मी हीरो की तस्वीर के साथ छपे मोटिवेट करने वाले एक वाक्य से. इसपर मोहर तब लगती है जब शहर की सबसे जानी-पहचानी बिल्डिंग के टाइट क्लोज़-अप के बाद फ़्रेम ढीला होता है और ‘ज़िन्दगी कैसी है पहेली’ सरीखे मोड में जाकर इतना खुल जाता है कि सड़क पर चलता बदहाल हीरो दिखाई देता है, जिसे हीरो होते हुए भी, रास्ते की तलाश है.
फ़िल्म में कुछ चीज़ें हैं जिन्होंने अपनी तरफ़ ध्यान खींचा है. इसमें 80 या शुरुआती 90 के दशक का हिंदी सिनेमा एक बड़ी चीज़ है. फ़िल्म में लगातार ऐसे मौके आते हैं जब आप, बतौर फ़िल्मची, टाइम ट्रैवेल कर रहे होते हैं. ये सब कुछ कैमरा और साउंड के ज़रिए करवाया जाता है. उस समय के फ़िल्मी पोस्टर, पीछे बजते गाने आदि, सब कुछ स्थापित करते हुए चलते हैं.
प्रियदर्शन. वो फ़िल्म डायरेक्टर जिसने हिंदी दर्शकों को ‘चुप चुप के’, ‘हेरा-फेरी’, ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘भूल भुलैया’ जैसी फ़िल्में दीं. ये डायरेक्टर अपनी कॉमेडी के लिए जाना जाता है. इनके काम में एक बात हर मौके पर मिलेगी – फ़िल्म के अंतिम हिस्से में सब कुछ होने लगता है. प्रियदर्शन की फ़िल्म के क्लाइमेक्स में वो ये नहीं देखते कि क्या लॉजिकल है और क्या नहीं. वो पूरी कहानी इसी मौके के लिए तैयार करते हैं, जहां दर्शकों को सबसे नॉन-सेन्स मोड में ले जाया जा सके. जबकि श्रीराम राघवन इसके ठीक उलट हैं.













