गुजरात में 2002 के दंगों के दौरान इन 11 लोगों ने बिलकिस बानो (जो उस वक़्त गर्भवती थीं) का सामूहिक बलात्कार किया था. इसके साथ ही 14 लोगों की हत्या भी की गई थी, जिनमें बिलकिस बानो की तीन वर्षीय बेटी भी शामिल थीं.
गुजरात पुलिस ने साल 2002 में कहा था कि इस केस को बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह अपराधियों को ढूंढ़ नहीं पाई है.
इसके बाद बिलकिस बानो ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस केस की जाँच सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन) से कराई जानी चाहिए.
इसके बाद ये मामला गुजरात से महाराष्ट्र भेजा गया.
साल 2008 में सीबीआई की विशेष अदालत ने इन 11 लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा दी.
आजीवन कारावास की सज़ा पूरे जीवन के लिए होती है लेकिन सरकार के पास ये अधिकार होता है कि वो अपराधी का अच्छा आचरण देखकर 14 साल बाद उसे रिहा कर दे. सरकार इस मामले में दूसरी शर्तें भी लागू कर सकती है, जैसे संबंधित क़ैदी को कब रिहा किया जाए.
कोर्ट के मुताबिक़, सज़ा माफ़ी का फ़ैसला महाराष्ट्र सरकार का था. कोर्ट ने कहा कि जिस राज्य में सज़ा सुनाई गई होती है वही सज़ा माफ़ी पर भी फ़ैसला करेगा. कोर्ट ने गुजरात सरकार पर भी कड़ी टिप्पणी की.
कोर्ट ने कहा कि गुजरात सरकार ने 11 में से एक अपराधी के साथ “मिलकर काम किया है और मिलीभगत की है”.
इसके साथ ही कोर्ट ने बोला कि पहले भी तीन बार कोर्ट को इन मामलों में दखल देना पड़ा, पहले जाँच पड़ताल गुजरात पुलिस से हटाकर सीबीआई को सौंपी और मुक़दमा भी गुजरात से हटाकर महाराष्ट्र भेजा.
कोर्ट ने ये भी कहा कि उनका 2022 का फ़ैसला ग़लत था.
इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजरात सरकार को 2022 के फ़ैसले के लिए समीक्षा याचिका फाइल करनी चाहिए थी.













